मंगलवार, 31 जनवरी 2017

      राजनीतिक प्रदूषण का मारा-                      गणतंत्र बेचारा !
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                        मनोज ज्वाला
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      २६ जनवरी सन १९५० से हमारे गणतंत्र की आरम्भ हुई यात्रा विविध राजनीतिक हालातों अवसरों चुनौतियों व प्रवृतियों से होती हुई आज एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गई है , जहां इसकी अब तक की उपलब्धियों पर गौर फरमाने की जरुरत महसूस हो रही है तो वहीं दूसरी ओर इसके गंतब्य की दृष्टि से इसके चाल-चलन और इसकी दशा-दिशा पर विमर्श करना भी आवश्यक प्रतीत हो रहा है । ऐसा इस कारण क्योंकि स्वतंत्रता आन्दोलन की कोख से उत्पन्न गणतंत्र की इस संवैधानिक अवधारणा को अपनाने के साथ हमारे देश के नीति नियन्ताओं ने जो लक्ष्य निर्धारित किये थे , मंजिलें तय की थी और इस यात्रा के जिन परिणामों की कल्पना की थी वो आज भी हमें प्राप्त नहीं हो सके हैं । हालाकि हमारी यात्रा एक दिन भी कहीं रुकी नहीं है , हम चलते ही रहे हैं लगातार , तरह-तरह के प्रयोग भी करते रहे हैं इस दरम्यान अनेक बार ।
              ऐसा भी नहीं है कि हमारे स्वतंत्रता-आन्दोलन के गर्भ से निकले संविधान की धुरी पर कायम लोकतंत्र नामक विमान को हांकने-चलाने वाले हमारे चालक-दल के लोग प्रशिक्षित नहीं रहे हैं , बल्कि सच तो यह है कि वे जरुरत से ज्यादा ही प्रशिक्षित और चालाक रहे हैं । उन्हें ब्रिटिश सरकार की काऊन्सिलों से लेकर कांग्रेस के विभिन्न संगठनों-कार्यक्रमों तक में प्रशिक्षण मिलते रहे थे और आज भी विविध रुपों में मिल रहे हैं । किन्तु किस तरह के प्रशिक्षण मिले इसकी एक-दो बानगियों पर गौर करना यहां प्रासंगिक प्रतीत हो रहा है ।
                   सन १९३४ में कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व ने नीचे की सभी कांग्रेस-ईकाइयों को निर्देश दिया कि वे सांगठनिक चुनाव करा कर समितियों का पुनर्गठन कर लें । तब अनेक सक्षम व धन-सम्पन्न कांग्रेसी नेताओं ने अपनी-अपनी जेबों से सदस्यता व खादी के पैसे खर्च कर फर्जी सदस्य बना-बना कर उनकी बदौलत संगठन में बडे-बडे पद हथिया लिए और निष्ठावान नेता-कार्यकर्ता मुंह देखते रह गए । देश के विभिन्न क्षेत्रों से महात्मा गांधी के ऐसी शिकायतों से भरे पत्र पहुंचने शुरू हो गए । बम्बई से कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने भी जब गांधी जी इस बावत पत्र लिखा और इस भ्रष्टाचार से दुखी हो कर कांग्रेस छोड दी की इच्छा जतायी तब महात्माजी को एक सप्ताह का प्रायश्चित उपवास करना पडा था ।  एक बानगी स्वतंत्रता से पहले की है- बाबू लक्ष्मी नारायण उन दिनों उतर प्रदेश में कांग्रेस के समर्पित नेता हुआ करते  थे । उनकी राष्ट्र-भक्ति-निष्ठा से प्रभावित होकर कांग्रेस ने उन्हें प्रान्तीय एसेम्बली में भेजने के लिए मनोनीत कर लखनऊ भेज दिया । एसेम्बली की सदस्यता ग्रहण करने के बावत शपथ-पत्र के साथ एक सरकारी अधिकारी उनके पास भेजा गया , जिसने उन्हें शपथ का मजमुन दिखाते हुए कहा- इसे पढ कर बेअटक बोलने का अभ्यास कर लीजिए , कल सदस्यता-समारोह में इसे दोहराना होगा । शपथ के मजमुन की पहली पंक्ति- “ मैं ब्रिटिश ताज के प्रति सच्ची निष्ठा के साथ वफादारी की  प्रतिज्ञा करता हूं……………….” को देखते ही लक्ष्मी बाबू भडक उठे- ऐसी शपथ मैं नहीं ले सकता , क्योंकि मैं तो ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ ही स्वतंत्रता की लडाई लड रहा हूं , इस कारण मैं अपने देश के प्रति निष्ठावान हूं , एसेम्बली का सदस्य बनने के लिए मैं अपनी निष्ठा नहीं बदल सकता । उनकी नाराजगी कांग्रेस के बडे नेता गोविन्द बल्लभ पंत के पास पहुंची । पंत जी ने उन्हें समझाया- यह शपथ महज औपचारिकता मात्र है , इसकी पंक्तियां शब्द-जाल के सिवाय और कुछ नहीं हैं , आपको शपथ ले लेनी चाहिए , जो भी लोग काऊंसिल की सदस्यता ग्रहण करते हैं , वे यह शपथ लेते ही हैं । बावजूद इसके लक्ष्मी बाबू नहीं माने और दो टूक शब्दों में इंकार कर दिए- मैं अपने राष्ट्र के प्रति निष्ठा का त्याग नहीं कर सकता । इस बानगी से दो बातें बिल्कुल साफ हैं । पहली यह कि  सन १८५७ के विद्रोह के बाद अपने औपनिवेशिक साम्राज्य की रक्षा के लिए  शासन में भारतीय जनता की भागीदारी के नाम पर कायम किए गए काऊंसिल ऐक्ट के तहत जो भी लोग निर्वाचित या मनोनीत होकर काऊंसिलों-एसेम्बलियों में जाते थे उन्हें ब्रिटिश हुक्मरान अपने साम्राज्य के प्रति निष्ठावान बनाने का प्रशिक्षण दिया करते थे ।  दूसरी बात यह कि कांग्रेस के नेताओं को इस चुनावी राजनीति के तहत पद-प्रतिष्ठा के लिए सिद्धांतों-आदर्शों से समझौता करते रहने अर्थात जनता को ठगने के विविध आडम्बरों-पाखण्डों का अभ्यास कराया जाता था । अब आजादी के बाद की एक दूसरी बानगी देखिए- संविधान को लागू करने से पूर्व सर्वसम्मति से राष्ट्रपति के चुनाव का जब मौका आया तब डा० राजेन्द्र प्रसाद के प्रति अघोषित सर्वानुमति पूर्व से ही कायम थी ; किन्तु प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू प्रसाद के बजाय राजगोपालाचारी को राष्ट्रपति बनाना चाहते थे । ऐसा इस कारण क्योंकि राजेन्द्र प्रसाद का व्यक्तित्व खालिस देशज प्रकृति का और हिन्दी के प्रति हिमायती प्रवृति का था , जो कदाचित नेहरू की अंग्रेजी मनोवृति के अनुकूल नहीं था ; जबकि राजगोपालाचारी नेहरू की ही तरह न केवल अंग्रेजीदां होने के कारण उनके पसंदीदा थे , बल्कि ब्रिटिश क्राऊन के प्रतिनिधि- लार्ड माऊण्ट बैटन के उतराधिकारी के तौर पर तत्कलीन गवर्नर जनरल होने की वजह से भी उन्हें ज्यादा सहज प्रतीत हो रहे थे । तब अपनी इस अलग-थलग इच्छा को समूचे भारत के गण्तंत्र पर थोपने के लिए उन्होंने राजेन्द्र बाबू को सूचित कर दिया कि सरदार पटेल से इस बावत उनकी बात पक्की हो गई है कि राजगोपालाचारी ही राष्ट्रपति होंगे इसलिए आप अपनी उम्मीदवारी वापस ले लें । एक खुफिया अधिकारी आरएनपी सिंह ने अपनी किताब 'नेहरू : ए ट्रबल्ड लीगेसी'  में दावा किया है कि “नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद को देश का पहला राष्ट्रपति बनने से रोकने के लिए झूठ बोला था” ।  राजेन्द्र बाबू को नेहरू क ऐसा छल-छद्म थोडा अटपटा सा लगा, क्योंकि राष्ट्रपति पद के लिए उनके नाम पर सहज-स्वाभाविक सर्वानुमति बहुत पहले से ही कायम थी , यद्यपि वे इसके लिए स्वयं प्रयत्नशील  नहीं थे , तथापि सच्चाई जांचने के लिए उन्होंने पटेल से दूरभाष पर पूछा तो उनका उतर सुन कर वे हतप्रभ रह गए । पटेल ने उन्हें बताया कि इस मुद्दे पर नेहरू से उनकी कभी कोई बात ही नहीं हुई है । वे चूंकि अंग्रेजीदां राजगोपालाचारी को राष्ट्रपति बनाना चाह रहे हैं, इस कारण मेरे नाम (पटेल) का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं ।
           इन तीनों बानगियों से स्पष्ट है कि सत्ता-तंत्र से बाहर रहने वाले लोग राष्ट्रीयता के सिद्धांतों, आदर्शों और जनाकांक्षाओं के प्रति निष्ठावान रहे हैं , आज भी हैं ; किन्तु सत्ता का स्वाद चख चुके माननीय ‘गणों’  का हाजमा इस कदर बिगडता और बढता जाता रहा है कि वे राष्ट्रीयता, सिद्धांतशीलता , आदर्शवादिता , वचनबद्धता व राष्ट्रीय निष्ठा जैसे वांछित सदगुणों को तो आत्मसात करने से कतराते रहे , जबकि राष्ट्रीय हितों और जनाकांक्षाओं को बडे आसानी से डकार कर हजम कर जाने और इस हेतु छल-छद्म , झूठ-फरेब और धन-बल का इस कदर इस्तेमाल करते रहे कि ऐसी तमाम अवांछनीयतायें ही भारतीय राजनीति की संस्कृति बन गईं ।  इस राजनीतिक ‘(अप)संस्कृति’ की मार से अपना गण्तंत्र भी इस कदर आहत होता रहा कि तंत्र के तमाम कल-पुर्जों में लोभ-लालच-स्वार्थ-प्रपंच-लिप्सा-लोलुपता के लार-मवाद रिसने-बिजबिजाने लगे । फलतः सत्ता-लिप्सा की इस बिजबिजाहट से उत्पन्न राजनीतिक दल-दल में जन-हित और देश-हित के मुद्दे ऐसे उलझ गए कि कभी किसी ईमानदार नेतृत्व ने उन्हें सुलझाने का प्रयत्न भी किया , तो वे और उलझते ही गए । पश्चिमोत्तर में कश्मीरी अलगाववाद का मामला हो या दक्षिण में हिन्दी विरोध का भाषाई मसला, समान नागरिक संहिता की आवश्यकता हो या जातीय आरक्षण का बढता सिलसिला, इन सब को राजनेताओं की सत्ता-लिप्सा ने ऐसे उलझा दिया है कि हमारे राष्ट्र-जीवन में जहर घुलता आ रहा है और हमारे गणतंत्र की धार कुंद होती जा रही है । इतना ही नहीं , अब तो राजनीति में  शुचिता, सिद्धांतशीलता व आदर्शवादिता जैसी धारणायें दुर्लभ होती जा रही और उनके  स्थान पर झूठे प्रचार , आडम्बर , पाखण्ड , दल-बदली , काली कमाई , रोश्वतखोरी , दलाली जैसी अवांछनीयतायें स्थापित हो चली हैं । इन सब राजनीतिक दुष्प्रवृतियों के प्रदूषण की वजह से हमारा गणतंत्र कमजोर हो रहा है । इस पर गर्व तो दूर , संतोष कर लेने का भी कोई कारण दिखाई नहीं पडता ।
·              मनोज ज्वाला ; जनवरी’ २०१७
·              दूरभाष- ९९७३९३६३९१
           

  






       महात्मा गांधी की हत्या का राजनीतिक समीकरण
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                   मनोज ज्वाला
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     महात्मा गांधी की हत्या के लिये रामचंद्र विनायक गोड्से उर्फ नत्थुराम गोड्से को ५०० रुपये में बीस बारुदी गोलियों के साथ एक नया बैरेटा पिस्टल उपलब्ध् करानेवाले होम्योपैथिक डाक्टर जगदीश प्रसाद गोयल उर्फ दत्तात्रेय परचुरे के विरुद्ध आज तक कोई कार्र्वाई नहीं होने तथा गोली लगने के बाद गांधी जी को अस्पताल न ले जाकर बिडला भवन में रखे रहने और उनके शव का पोस्टमार्टम नहीं कराये जाने से उस मामले की जांच पर विश्वसनीयता के सवाल आज भी खडे प्रतीत हो रहे हैं ।  हालाकि इस मामले की अदालती प्रक्रिया का पटाक्षेप दशकों पूर्व ही  किया जा चुका है । हत्या के दोषी नत्थू गोड्से के साथ उस के परोक्ष साझेदार नारायण आप्टे…और विष्णु करकरे…को फांसी तथा तीन अन्य को षड्यंत्र में सहयोग का दोषी सिद्ध करते हुये आजीवन कारावास की सजा दी जा चुकी है । किन्तु , उस हत्याकांड से जुडे कई ऐसे पहलुओं की तो जांच ही नहीं की गयी या नहीं होने दी गयी , जिनसे कुछ विशिष्ट लोग भी दोषी सिद्ध हो सकते थे।
            मालूम हो कि हत्या के षड्यंत्र की जानकारी न केवल तत्कालीन कांग्रेसी सरकार को थी, बल्कि कांग्रेस के तमाम बडे नेताओं सहित प्रशासन के कई बडे अधिकारियों को भी थी । तब भी महात्माजी की सुरक्षा  के प्रति सरकारी  अमला की उदासीनता से कई ऐसे संदेह उत्पन्न होते हैं जिन पर आप गौर करेंगे तो उक्त षड्यंत्र. मे  सहयोग के दोषियों की संख्या बढ सकती है । न केवल संख्या बढ सकती है , बल्कि उस फेहरिस्त में दो ऐसे नाम भी जुड सकते हैं , जो भारत और इंग्लैण्ड दोनों देशों में अति विशिष्ट नाम हैं ।
            उल्लेखनीय है कि हत्या की तारिख (३० जनवरी.१९४८) से दस दिन पहले २० जनवरी को भी गांधीजी को मार डालने के लिये दिल्ली स्थित बिड्ला भवन के उनके प्रार्थना-स्थल के निकट एक बम फटा था , जिससे गांधीजी बाल-बाल बच गये थे, जबकि बम रखनेवाला मदनलाल पाहवा नामक शरणर्थी पुलिस के हाथों गिरफ्तार कर लिया गया था । पाहवा ने तो महात्माजी को मार डालने हेतु उसके साथियों के षड्यंत्र का खुलासा भी पुलिस के समक्ष कर दिया था । उन षड्यंत्रकारियों के जो नाम पाहवा ने पुलिस को बताये थे , उनमें से प्रत्येक को दिल्ले-बम्बई-पूणे की पुलिस जानती थी और उन्हीं लोगों ने बाद में गांधी-हत्या को अंजाम भी दिया । किन्तु , जिन लोगों को उस षड्यंत्र की पूर्व जानकारी मिल गयी थी और जो लोग उसे नाकाम कर देने में सक्षम थे , उनने देश-विभाजन से उत्पन्न खतरनाक खूनी हालातों से जूझ रहे महात्मा को पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध कराने की दिशा में कोई खास पहल की ही नहीं । और तो और , बिडला भवन परिसर में उनकी सुरक्षा के लिये पहले से तैनात पुलिस के मुख्य अधिकारी को भी ३० जनवरी के दिन किसी प्रशासनिक बैठक के निमित्त वहां से हटा दिया गया था । बावजूद इसके दफ्तरी तौर पर षडयंत्र के तमाम जानकारों को संदेह के दायरे से दूर ही रखा गया ।    
                 हत्याकाण्ड  में स्वातंत्र्यवीर विनायक सावरकर को तो गांधी का प्रबल विरोधी होने और उस षडयंत्र की पूर्व-जानकारी रखने की महज कपोल-कल्पित आशंका के आधार पर जांच-अधिकारियों ने आरोपित कर दिया था , किन्तु गौरतलब है कि गांधी के विरोधी वे दूसरे प्रभावशाली लोग भी थे, जो प्रामाणिक तौर पर षड्यंत्र की जानकारी रखने और शासन-सत्ता से जुडे होने के कारण उसे विफल भी कर सकते थे । मगर उन लोगों की ओर तनिक संदेह भी नहीं किया गया । गांधीजी की तत्कालीन रीति-नीति एवं योजना से कांग्रेस के सबसे बडे नेता ही उनके प्रबल विरोधी बन गये थे ।
             महात्मा के महात्म्य के सहारे सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे वे स्वनामधन्य नेता महात्माजी को किस कदर अप्रासांगिक समझने लगे थे , यह जानने के लिये सिर्फ एक ही उदाहरण पर्याप्त है.-  देश की आजादी जब सुनिश्चित हो गयी, तब महात्माजी ने कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष व देश के अंतरीम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु को पत्र लिखा था, स्वतंत्र भारत की शासन-व्यवस्था का स्वरुप निर्धारित करने के लिये ।  उन्होंने इच्छा व्यक्त की थी कि देश में भारत की जरुरत के अनुसार उनके सपनो का “हिन्द-स्वराज” स्थापित किया जाये.। लम्बे समय तक चले ततविषयक पत्र-व्यवहार के दौरान नेहरुजी ने अंततः उन्हें बडी बेरूखी से झिड्क दिया कि हम भारत में लोकतान्त्रिक-समाजवाद की स्थापना करेंगे, “ हिन्द-स्वराज “ जैसी फालतू बातों पर चर्चा के लिये न उनके पास समय है, न कांग्रेस के पास । गांधीजी निरूत्तर हो गये । पुनः आजादी के बाद मंत्रिमंडल में शामिल कांगेसी नेताओं के भ्रष्टाचरण पर क्षोभ जताते हुये महात्माजी ने जब यह सिफारिश कर दी कि “ देश को आजादी दिलाने का उद्देश्य पूरा हो गया सो अब कांग्रेस का एक राजनीतिक-संगठन के रुप में काम करना उचित नहीं है, क्योंकि देश में हरिजनोद्धार व ग्रामीण-पुनर्निंर्माण के अनेक महत्वपूर्ण काम करने को पडे हुये हैं , इसलिए कांग्रेस को भंग कर उसे  ‘लोकसेवक संघ’ बना दिया जाये , तो नेहरुजी ने उस पर नाराजगी जताते हुए साफ इंकार कर दिया था ।
              तभी से महात्माजी कांग्रेस के क्रिया-कलापों से न केवल असहमत रहने लगे थे , बल्कि सत्ता मिलते ही कांग्रेस की कार्य-संस्कृति में घुस आये भ्रष्टाचार की सार्वजनिक मुखालफत भी करने लगे थे । इतना ही नहीं , बल्कि वे कुछ समय पहले से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्पृश्यता-रहित समाज-निर्माण के कार्यों से प्रभावित हो उसकी ओर झुकाव भी रखने लगे थे । २५ दिसम्बर १९३४ को वे वर्धा में आयोजित संघ के एक प्रशिक्षण शिविर और १६ सितम्बर १९४७ को दिल्ली की भंगी बस्ती में लगी संघ-शाखा पर जाकर उसकी कार्य-शैली की प्रशंसा ही नहीं किए थे , बल्कि स्वयंसेवकों के साथ भगवा ध्वज को प्रणाम कर उसकी वन्दना भी कर चुके थे । ऐसे में आप समझ सकते हैं कि महात्मा जी के जीवन के प्रति कौन लोग उदासीन थे ? जिस संगठन को वे भंग कर देने की सिफारिश कर दिये थे उसके नेता ? या जिस हिन्दुत्वनिष्ठ-संगठन की ओर उनका झुकाव होने लगा था उस हिन्दुत्व के प्रखर प्रवक्ता  ? 
          बावजूद इसके , महात्माजी के जीते-जी उनकी नीतियों की हत्या करनेवालों ने उनकी शरीर-हत्या हो जाने पर खुद को उनका उतराधिकारी-भक्त प्रदर्शित करने तथा राजनीतिक लाभ लेने के लिये शासनिक शक्ति के सहारे  विभाजन-जनित हिन्दू-मुस्लिम-विद्वेष के उस दौर में सावरकर और संघ का नाम आरोपित करवा दिया । सावरकर को जेल में डलवा दिया और संघ पर प्रतिबन्ध लगवा दिया । हांलाकि न्यायालय ने सावरकर को निष्कलंक आरोप-मुक्त कर दिया और संघ को भी प्रतिबन्ध से मुक्त कर दिया , किन्तु दोनों के विरुद्ध जो दुष्प्रचार किया गया उसका राजनीतिक लाभ तो कांग्रेस आज तक ले ही रही है । “सफेद-आतंक ः ह्यूम से माईनो तक” नामक मेरी पुस्तक में इस मुद्दे पर व्यापक बहस-विमर्श हुआ है । परिस्थिति-जन्य साक्ष्य बताते हैं कि कांग्रेस का सत्ता-लोलुप शीर्ष नेतृत्व और उसके हाथों सत्ता हस्तांतरित करने वाले ब्रिटिश वायसराय,  दोनों को महात्माजी दो कारणों से चूभ रहे थे । एक को कांग्रेस भंग कर देने की उनकी योजना के कारण तो दूसरे को देश-विभाजन की रेखा मिटा देने की उनकी तैयारी के कारण । मालूम हो कि देश-विभाजन से उत्पन्न हिंसक-उन्मादी हालातों की वजह इस कदर मर्माहत थे कि वे विभाजन-रेखा मिटा देने के लिए एक विशाल जुलूस लेकर पाकिस्तान जाने , वहां कुछ दिन रहने और फिर लम्बे जुलूस के साथ भारत वापस आने की एक गुप्त योजना के क्रियान्वयन की तैयारी कर चुके थे । उनकी इस योजना का संक्षिप्त खुलासा ‘लापियर एण्ड कालिन्स की पुस्तक फ्रीडम ऐट मिडनाइट’ में हुआ है , जिसके अनुसार अगर वे सफल हो जाते तो विभाजन मिट सकता था । ऐसी परिस्थितियों में कदाचित लार्ड माऊण्ट बैटन और नेहरू दोनों ही महात्मा को भारत के राजनीतिक क्षितिज से दूर कर देने की जुग्गत में रहे हों , जिन्हें नत्थूराम गोडसे की योजना का पता चला तो वे अप्रत्यक्ष रूप से उसे सफल हो जाने की तमाम अनुकूलतायें उपलब्ध करा दिए हों ; इस सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है । किन्तु इन सब कोणों से उस मामले की जांच हुई ही नहीं और जांच-प्रक्रिया को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर घुमा कर दिग्भ्रमित कर दिया गया ।
·      मनोज ज्वाला ; जनवरी’ २०१७
·      दूरभाष- ९९७३९३६३९१