गणतंत्र के
६७ वर्ष ; अनर्थ ही अनर्थ
---------------------------------------------------
मनोज ज्वाला
==============================
==============================
२६ जनवरी सन १९५० से जन-मन के बीच हमारे गणतंत्र की आरम्भ हुई यात्रा
विविध राजनीतिक हालातों अवसरों चुनौतियों व प्रवृतियों से होती हुई आज एक ऐसे मुकाम
पर पहुंच गई है , जहां एक ओर इसकी अब तक की उपलब्धियों पर गौर फरमाने की जरुरत महसूस
हो रही है , तो वहीं दूसरी ओर इसके गंतब्य की दृष्टि से इसके चाल-चलन और इसकी दशा-दिशा
पर विमर्श करना भी आवश्यक प्रतीत हो रहा है । ऐसा इस कारण क्योंकि स्वतंत्रता आन्दोलन
की कोख से उत्पन्न इस गणतंत्र की संवैधानिक अवधारणा को अपनाने के साथ हमारे देश के
नीति-नियन्ताओं ने ‘जन-मन’ की आकांक्षाओं के अनुरूप जो लक्ष्य निर्धारित किये थे ,
मंजिलें तय की थी और इस यात्रा के जिन परिणामों की कल्पना की थी वो आज भी हमें प्राप्त
नहीं हो सके हैं । हालाकि हमारी यात्रा एक दिन भी कहीं रुकी नहीं है , हम चलते ही रहे
हैं लगातार , तरह-तरह के प्रयोग भी करते रहे हैं इस दरम्यान अनेक बार ।
ऐसा भी नहीं है कि हमारे स्वतंत्रता-आन्दोलन
के गर्भ से निकले संविधान की धुरी पर कायम गणतंत्र के रथ को लोकतंत्र की पटरी पर हांकने-चलाने
वाले हमारे सारथी-दल के लोग प्रशिक्षित नहीं रहे हैं , बल्कि सच तो यह है कि वे जरुरत
से ज्यादा ही प्रशिक्षित और चालाक रहे हैं । उन्हें ब्रिटिश सरकार की काऊंसिलों से
लेकर कांग्रेस नामक तत्कालीन राजनीतिक मंच के माध्यम से प्रशिक्षण मिलते रहे थे और
आज भी विविध रूपों में सदैव मिल ही रहे हैं ।
किन्तु , युरोप से आयातित लोकतंत्र की पट्टी पर सत्ता का सवाल हल करने के लिए
चुनावी अंकगणित के संख्या-समीकरण का पाठ रट-पढ कर इस गणतंत्र के रथ का संचालन-परिचालन
करने वाले रथियों-सारथियों-रहनुमाओं ने जन-मन की उपेक्षा करते हुए इसका वास्तविक-मौलिक
अर्थ बदल कर अनैतिक-अवांछित अनर्थ कायम कर
दिया है ।
इसकी शुरुआत तभी से हो गई थी जब सन १९४६
में अंतरीम सरकार के गठन से पहले कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होने लगा
तब उसकी सोलह में बारह प्रांतीय समितियों के सर्व-सम्मत निर्णय के आधार पर केन्द्रीय
कार्यकारिणी के अधिकतर सदस्यों ने सरदार पटेल के पक्ष में मतदान कर दिया , किन्तु ऐन
मौके पर महात्मा गांधी ने पटेल को अध्यक्ष बनने से मना करते हुए सबको नेहरू के शब्दों
में ही समझाया कि “ नेहरू अगर अध्यक्ष नहीं
बन पाया , तो वह प्रधानमंत्री भी नहीं बन पाएगा और तब कोई नहीं जानता कि वह क्या ‘अनर्थ’
कर देगा ” । प्रसिद्ध कांग्रेसी नेता व स्वतंत्र भारत के प्रथम मंत्रिमण्डल के सदस्य
वी० एन० गाडगिल ने अपनी पुस्तक- ‘गवर्न्मेण्ट फ्राम इनसाइड’ में इस प्रसंग का उल्लेख
करते हुए विस्तार से जो लिखा है उसका सार यह है कि “ नेहरू ने कार्यकारिणी के सदस्यों
को एक तरह से धमका कर गांधी जी के सहारे अध्यक्ष का पद हासिल किया, जिसकी बदौलत आगे
वे अंतरीम सरकार के प्रधानमंत्री बन सके और फिर स्वतंत्र भारत की सत्ता हासिल कर भारतीय
गणतंत्र के नियामक बन बैठे ” ।
प्रधानमंत्री रहते हुए जवाहर लाल नेहरू
ने पूरे कांग्रेस संगठन को किस कदर अपनी मुट्ठी में रखा और किस तरह से अपनी पुत्री
को संगठन के शीर्ष पर स्थापित कर दिया यह तथ्य अगर सबको मालूम नहीं भी है , तो कम से
कम इतना तो सभी जानते ही हैं कि कांग्रेस के अध्यक्ष तथा देश के प्रधानमंत्री का पद
इंदिरा गांधी को सिर्फ और सिर्फ इसी कारण सहज हासिल हो सका कि वो उनके वंश की इकलौती
संतान थीं । फिर राजीव गांधी किस आधार पर प्रधानमंत्री बने तथा सोनिया गांधी किस राजनीतिक
प्रतिभा के बूते कांग्रेस की अध्यक्ष बन गई और उनका पुत्र किस आधार पर आज प्रधानमंत्री
का उम्मीदवार बना हुआ है , यह यहां का अदना सा आदमी भी जानता है । लाल बहादुर शास्त्री
के अत्यल्प कालखण्ड और राजीव गांधी की हत्या से उत्पन्न परिस्थितियों के कारण प्रधानमंत्री
बने पी०वी०नरसिंम्हाराव के कार्य-काल को छोड
कर इस ‘लोकतांत्रिक गणतंत्र’ और ‘गणतांत्रिक लोकतंत्र’ के सबसे बडे सहयात्री दल को
देखने पर उसके भीतर के क्षेत्रीय क्षत्रप भी ‘वंशतंत्र’ का बीज-वृक्ष बोते-सिंचते हुए
उसके फलों से अपना-अपना स्वार्थ साधते हुए जन-गण-मन की आकांक्षाओं का गला घोंटते ही
दिखाई देते रहे हैं ।
देश में ब्रिटिश पार्लियामेण्ट
द्वारा तैयार की गई संसदीय राजनीति की जमीन पर गणतंत्र के बीजारोपण के पश्चात उसके
पल्लवित-पुष्पित होने में कांग्रेस की भूमिका एक माली की तरह रही, इससे कोई इंकार नहीं
कर सकता । किसी पौधे की जडों में माली जिस तरह से जैसा खाद-पानी डाल कर उसका पोषण करता
है , उसी के अनुरूप उसका प्रतिफलन होता है । जाहिर है , आज अपने गणतंत्र की जो हालत
है , उसके लिए कांग्रेस के साथ-साथ नेहरू ही ज्यादा जिम्मेवार हैं, जिन्होंने इसे
‘वंशतंत्र’ में तब्दील कर दिया । क्योंकि , प्रारम्भिक दौर में उनके द्वारा कांग्रेस
की जो रीति नीति विकसित की गई , वही बाद में
भारतीय राजनीति व लोकतंत्र की संस्कृति और हमारे गणतंत्र एवं इसके रखवालों की प्रवृति
बन गई । इंदिरा गांधी द्वारा स्वयं के भ्रष्टाचार
पर पर्दा डालने के लिए ‘आपात-स्थिति’ के नाम पर ‘गणतंत्र’ को बंधक बना कर कायम की गई
तानाशाही और राजीव गांधी द्वारा रक्षा-हथियारों की खरीद में की गई रिश्वतखोरी की कोख
से उपजी वे सभी सरकारें भी उसी लीक पर चलती रहीं जिसे गणतंत्र की स्थापना
के साथ ही कांग्रेस ने खींच रखी थी । इसका कारण यह था कि गैर-कांग्रेसवाद के नाम पर
कायम हुए वे दल वास्तव में गैर-कांग्रेसी थे ही नहीं, क्योंकि वे सब तो कांग्रेस से
निकले और निकाले हुए लोगों का जमावडा मात्र थे, जिनमें से कुछ आज भी हैं । वामपंथी
साम्यवाद और दक्षिणपंथी समाजवाद भी वस्तुतः कांग्रेस के ही खर-पतवार व सिपहसालार सिद्ध
होते रहे हैं , क्योंकि संविधान में ईजाद किए गए ‘धर्मनिरपेक्षता’ नामक मायावी शब्द-जाल
के सहारे इन दोनों ही विचारधाराओं के झण्डाबरदार नेतागण सत्ता-सुख भोगने हेतु अपनी-अपनी
सुविधानुसार कांग्रेस के ‘सत्तावाद’ से ही हाथ मिलाते रहे हैं ।
इंदिरा गांधी के शासन-काल में हुए पाक-विखण्डन
व बांग्लादेश के सृजन तथा बैंकों के राष्ट्रीयकरण और राजाओं-रजवाडों के प्रिवी-पर्श
(पेंशन) के समापन से एक ओर हमारे गणतंत्र की सम्प्रभुता में चमक तो आई , किन्तु वहीं
से गणतंत्र का क्षरण भी आरम्भ हो गया । उच्च न्यायालय के फैसले के विरूद्ध देश पर
‘आपात-स्थिति’ थोप कर तमाम गणतांत्रिक संस्थाओं की स्वायतता-स्वतंत्रता को अपनी तानाशाही
की मुट्ठी में कैद कर लेने का इंदिरा गांधी का फैसला और उस दौरान उनके द्वारा राजनीतिक
लाभ के लिए संविधान को अनाप-सनाप अनेक संशोधनों से आहत किया जाना वास्तव में उनके ऐसे
कदम थे, जिनकी वजह से न केवल गणतंत्र , बल्कि हमारा लोकतंत्र भी ‘बलतंत्र’ में रुपान्तरित हो कर कई संक्रामक बीमारियों से पीडित
हो गया । मालूम हो कि आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने विरोधियों-विपक्षियों को सलाखों
के भीतर डाल कर अपने राजनीतिक लाभ के लिए संसद में विपक्ष की उपस्थिति के बगैर संविधान
में इतना अधिक संशोधन कर दिया कि उस दौर में संविधान को ‘इंदिरा संविधान’ कहा जाने
लगा था । हालाकि आपातकाल के बाद मोरारजी देशाई के नेतृत्व में सत्तासीन हुई जनता पार्टी
की सरकार द्वारा इंदिरा की तनाशाही से संविधान में किये गए अधिकतर संशोधनों को निरस्त कर दिया गया , किन्तु
देश की राजनीति में इंदिरा गांधी द्वारा कायम की गई दुष्प्रवृतियों का उन्मूलन आज तक
नहीं किया जा सका ।
नेताओं में निजी लाभ के लिए कानून
व पद का मनमाना इस्तेमाल करने तथा चुनाव जीतने के लिए धन-बल का असीमित उपयोग करने और सत्ता हासिल करने के निमित्त नीतियों-सिद्धांतों-आदर्शों
से इतर , कुछ भी अनैतिक करने में नहीं हिचकने जैसी प्रवृतियों को इंदिरा गांधी के फैसलों
से ही पंख लग गए । राजीव गांधी के शासनकाल में तो हालत ऐसी हो गई कि यह पूरा तंत्र
‘लूटतंत्र’ में इस कदर तब्दील हो गया कि स्वयं प्रधानमंत्री ने ही यह कह दिया था कि
दिल्ली से गांवों को जाने वाली बजट-राशि के अस्सी प्रतिशत भाग ऊपर-ऊपर ही लूट लिए जाते
हैं, महज बीस प्रतिशत ही धरातल पर पहुंच पाते हैं । बाद के काल-खण्ड में जनता दल के
विश्वनाथप्रताप सिंह व इन्द्र कुमार गुजराल और एच० डी० देवगौडा व समाजवादी चन्द्रशेखर
के नेतृत्व-प्रधानमंत्रित्व में बनी गैर-कांग्रेसी सरकारों की बात करें तो वह हमारे
लोकतंत्र और गणतंत्र के क्षरण का ही प्रतिफलन था । यह वही दौर था जब अपने देश में राजनीति
मण्डी बन गई , लोकतंत्र उद्योग बन गया और गणतंत्र व्यापारिक प्रतिष्ठान । जयप्रकाश
नारायण व राममनोहर लोहिया के समाजवाद के नाम पर उनके चेलों-चमचों ने गणतंत्र के आंगन
में संविधान की आंच पर अंग्रेजों के शासनकाल से ही चढी हुई जातीय आरक्षण की कडाही में
सामाजिक न्याय की चासनी से युक्त दलितवाद , महादलितवाद , बहुजनवाद , क्षेत्रीयतावाद
, अल्पसंख्यकवाद , पिछडावाद , अति पिछडावाद जैसे किसिम-किसिम के पकवान पका-पका कर अपना-अपना
‘वोटबैंक’ बनाने वास्ते राजनीति की मण्डी में उतार दिया , जिससे समूचे लोकतंत्र का जायका ही बिगाड गया । फिर तो राष्ट्र की एकता ,
अखण्डता व राष्ट्रीय अस्मिता की कीमत पर भी वोट बटोरने और सता सुख भोगने को ही राजनीति
का साध्य माना जाने लगा । सत्ता हासिल करने
और सत्ता में बने रहने के लिए जनता के ‘मतों’ से ले कर जन-प्रतिनिधि कहलाने वाले विधायकों
सांसदों तक की खरीद-फरोख्त होने लगी । इसकी रोकथाम के लिए दल-बदल विधेयक से कानून बना
तो ‘बीमारी का मर्ज ‘घटने के बजाय और बढता ही गया- ‘सदन के घोडे’ थोक भाव में रातोंरात
एक तिहाई से अधिक संख्या-समूह में दल-बदल करने लगे । देश में ऐसा वातावरण निर्मित हो
गया कि लोग सहज ही यह महसूस करने लगे कि हमारे गणतंत्र का संविधान ही गडबड है । कांग्रेसी
प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव द्वारा संसद में अपना बहुमत सिद्ध करने वास्ते झारखण्ड मुक्ति
मोर्चा के नेता को चालीस लाख रुपये घूस दिए जाने से गणतंत्र को ‘बिक्रीतंत्र’ में तब्दील
कर देने का जो अनर्थकारी सिलसिला शुरू हुआ , सो मनमोहन सिंह की ओर से समाजवादी अमर
सिंह के हाथों गैर कांग्रेसी सांसदों की खरीद हेतु प्रयुक्त हुए करोडों रुपयों का भाजपाइयों
द्वारा सदन में ही सरेआम मुद्रामोचन कर दिए जाने से गणतंत्र के बेआबरू हो ‘बेशर्मतंत्र
में तब्दील हो जाने तक चला । इस दौरान जनता की आशाओं-अपेक्षाओं और स्वतंत्रता-आन्दोलन
के हमारे नेताओं-शहीदों के सपनों पर पानी फेरा जाता रहा । महात्मा गांधी के जिस ‘हिन्द
स्वराज’ विषयक चिन्तन-दर्शन से स्वतंत्रता आन्दोलन को सम्बल मिला था , उसे तो उनकी
उस पुस्तक के पन्नों से बाहर निकलने ही नहीं दिया गया । न शिक्षा-पद्धति बदली
, न बदली अर्थ नीति ; अंग्रेजों के जाने के
बाद और छा गई अंग्रेजी । शासनतंत्र का ढांचा वही का वही रहा , कानून भी हैं वही के वही । आज गांव उजड रहे हैं , शहर पसरते जा
रहे हैं । गरीब और गरीब होता जा रहा , अमीर और अमीर । हर क्षेत्र में विकास की पश्चिमी
अवधारणा के अंधानुकरण की ऐसी होड मची हुई है कि जिन दो सभ्यताओं-संस्कृतियों के जिस
संघर्ष को सहस्त्राब्दी के हमारे महानायक महात्मा ने ‘स्वतंत्रता-संघर्ष’ कहा था ,
उसमें हमारी सभ्यता-संस्कृति पश्चिम से बुरी
तरह ग्रसित होती जा रही है और ‘सबरमति के संत’ की आत्मा ‘हे राम’ पुकार रही है । देश में काली कमाई बढ रही है और बढ रहा है काला
धन , तो जाहिर है अपना गणतंत्र भी निर्मल-धवल
नहीं है , इसकी दशा-दिशा ठीक नहीं है और ठीक
नहीं है इसकी चाल-चलन ।
गणतंत्र की इस लम्बी यात्रा के दौरान
‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को ले कर जनसंघ-भाजपा का भी उद्भव और विकास हुआ, जो वंशवाद-जातिवाद-परिवारवाद-क्षेत्रीयतावाद
की राजनीति के भ्रष्टाचरण से उलट ‘राजनीतिक शुचिता’ की दुहाई के साथ ‘औरों से भिन्न’
होने का दम्भ भरती हुई गणतंत्र का वास्तविक अर्थ कायम करने के बावत ‘संविधान-समीक्षा’
की घोषणा के साथ अपने लोकप्रिय राजनेता अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में सत्तासीन
हुई , किन्तु उन्हीं गैर-कांग्रेसी दलों से गठबंधन कायम कर के , जिनसे ‘भिन्न’ होने
का दावा करती रही । जाहिर है , ऐसे में वह भी कुछ ‘भिन्न’ नहीं कर सकी, क्योंकि जिनकी
कथनी-करनी से भिन्न होने का उसका दावा था , उन्हीं कांग्रेसी रीति-नीति-प्रकृति-प्रवृति
वाले गैर-कांग्रेसी दलों से उसने गठबन्धन कायम किया हुआ था । लिहाजा , उसके शासन-कल
में भी गणतंत्र का क्षरण ‘खिचडी तंत्र’ के रूप में बदस्तूर जारी ही रहा । तदोपरांत
फिर दस वर्षों तक सत्तासीन रही कांग्रेस देश की सत्ता का संचालन-सूत्र सोनिया को और
प्रधानमंत्री का पद मनमोहन सिंह को थमा कर गणतंत्र की बची-खुची ‘गणमान्यता’ को भी धूल-धुसरित
कर इसे ‘रिमोटतंत्र’ और ‘गौण-मौनतंत्र’ के साथ-साथ ‘गबनतंत्र’ , ‘घोटालातंत्र’, ‘धनतंत्र’,
जैसे अनर्थ प्रदान करती हुई लोकतंत्र को मुंह चिढाने लगी , जिसकी परिणति हुई उसी भाजपा
की पुनर्वापसी, जो पिछली बार ‘संविधान समीक्षा आयोग’ तो बना चुकी थी लेकिन समीक्षा
की दिशा में एक कदम भी आगे बढा नहीं सकी ।
अब १६वीं संसदीय चुनाव के परिणामस्वरूप
नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की पुनर्वापसी दर-असल उसी कांग्रेसी रीति-नीति
व प्रवृति के साथ हुई है , जिसके कारण गणतंत्र की अब तक अनर्थकारी ऐसी-तैसी होती रही
है । संविधान-समीक्षा की उसकी घोषणा तो वहीं की वहीं रह गई , अलबता सत्ता में आते ही
भाजपा ने भी अपनी नीतियों को लागू करने के लिए कांग्रेस की ही तरह संविधान में संशोधन
करना ही मुनासिब समझा । मालूम हो कि हमारा गणतंत्र जिस संविधान के आधार पर खडा है उसमें
सन १९५० से अब तक ६७ वर्षों के अन्दर १२२ संशोधन हो चुके हैं । सवाल उठता है कि हमारा गणतंत्र
जिन चुनौतियों से घिरा हुआ है , उनसे निबटने के लिए इसके आधार-स्तम्भ कहे जाने
वाले संविधान में नित नये संशोधनों का सिलसिला आगे बढाते रहना ही निदान है , या वर्तमान
की आवश्यकता व भविष्य की भवितव्यता और जन-मन की स्वीकार्यता के हिसाब से एक बार
संविधान की समीक्षा कर लेना बेहतर समाधान है ?
यहां गौरतलब है कि हमारा गणतंत्र भले ही
महज ६७ वर्षों का है , किन्तु यह गणतंत्र जिस आधार पर टिका हुआ है उस संविधान का अधिकतर
भाग भारत पर अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की सुविधा व अनुकूलता के हिसाब से ब्रिटिश पार्लियामेण्ट द्वारा सन १८६१ में पारित ‘इण्डिया काऊंसिल ऐक्ट’ तथा सन १९३५ के ‘इण्डिया गवर्न्मेंट ऐक्ट’ और १९४६ के ‘कैबिनेट मिशन ऐक्ट’ तथा सन १९४७ के
‘इण्डियन इंडिपेण्डेंस ऐक्ट’ का संकलन और इन्हीं चारो अधिनियमों का विश्लेष्ण है ।
शेष भाग दुनिया के विभिन्न देशों के संविधानों से लिए गए प्रावधानों का मिश्रण है, जबकि भारतीय जन-मन का प्रकटिकरण तो इसमें कम ही है । अब जरूरत यह है कि भारतीय ‘जन-मन’
के अनुसार इस ‘गणतंत्र’ का परिष्करण हो तथा “इण्डिया दैट इज भारत” के संविधान का “भारत
दैट इज इण्डिया” के रूप में रूपान्तरण हो और महात्मा जी के ‘हिन्द स्वराज’ अर्थात
‘भारतीय तरीके से भारत के राज-काज’ का संचालन हो ।
·
मनोज ज्वाला ; जनवरी’
२०१७
·
दूरभाष- ९४३१३०८३६२
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें