महात्मा गांधी की हत्या का राजनीतिक समीकरण
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मनोज ज्वाला
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महात्मा गांधी की हत्या के लिये रामचंद्र
विनायक गोड्से उर्फ नत्थुराम गोड्से को ५०० रुपये में बीस बारुदी गोलियों के साथ एक
नया बैरेटा पिस्टल उपलब्ध् करानेवाले होम्योपैथिक डाक्टर जगदीश प्रसाद गोयल उर्फ दत्तात्रेय
परचुरे के विरुद्ध आज तक कोई कार्र्वाई नहीं होने तथा गोली लगने के बाद गांधी जी को
अस्पताल न ले जाकर बिडला भवन में रखे रहने और उनके शव का पोस्टमार्टम नहीं कराये जाने
से उस मामले की जांच पर विश्वसनीयता के सवाल आज भी खडे प्रतीत हो रहे हैं । हालाकि इस मामले की अदालती प्रक्रिया का पटाक्षेप
दशकों पूर्व ही किया जा चुका है । हत्या के
दोषी नत्थू गोड्से के साथ उस के परोक्ष साझेदार नारायण आप्टे…और विष्णु करकरे…को फांसी
तथा तीन अन्य को षड्यंत्र में सहयोग का दोषी सिद्ध करते हुये आजीवन कारावास की सजा
दी जा चुकी है । किन्तु , उस हत्याकांड से जुडे कई ऐसे पहलुओं की तो जांच ही नहीं की
गयी या नहीं होने दी गयी , जिनसे कुछ विशिष्ट लोग भी दोषी सिद्ध हो सकते थे।
मालूम हो कि हत्या के षड्यंत्र की जानकारी
न केवल तत्कालीन कांग्रेसी सरकार को थी, बल्कि कांग्रेस के तमाम बडे नेताओं सहित प्रशासन
के कई बडे अधिकारियों को भी थी । तब भी महात्माजी की सुरक्षा के प्रति सरकारी अमला की उदासीनता से कई ऐसे संदेह उत्पन्न होते
हैं जिन पर आप गौर करेंगे तो उक्त षड्यंत्र. मे
सहयोग के दोषियों की संख्या बढ सकती है । न केवल संख्या बढ सकती है , बल्कि
उस फेहरिस्त में दो ऐसे नाम भी जुड सकते हैं , जो भारत और इंग्लैण्ड दोनों देशों में
अति विशिष्ट नाम हैं ।
उल्लेखनीय है कि हत्या की तारिख (३० जनवरी.१९४८)
से दस दिन पहले २० जनवरी को भी गांधीजी को मार डालने के लिये दिल्ली स्थित बिड्ला भवन
के उनके प्रार्थना-स्थल के निकट एक बम फटा था , जिससे गांधीजी बाल-बाल बच गये थे, जबकि
बम रखनेवाला मदनलाल पाहवा नामक शरणर्थी पुलिस के हाथों गिरफ्तार कर लिया गया था । पाहवा
ने तो महात्माजी को मार डालने हेतु उसके साथियों के षड्यंत्र का खुलासा भी पुलिस के
समक्ष कर दिया था । उन षड्यंत्रकारियों के जो नाम पाहवा ने पुलिस को बताये थे , उनमें
से प्रत्येक को दिल्ले-बम्बई-पूणे की पुलिस जानती थी और उन्हीं लोगों ने बाद में गांधी-हत्या
को अंजाम भी दिया । किन्तु , जिन लोगों को उस षड्यंत्र की पूर्व जानकारी मिल गयी थी
और जो लोग उसे नाकाम कर देने में सक्षम थे , उनने देश-विभाजन से उत्पन्न खतरनाक खूनी
हालातों से जूझ रहे महात्मा को पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध कराने की दिशा में कोई खास
पहल की ही नहीं । और तो और , बिडला भवन परिसर में उनकी सुरक्षा के लिये पहले से तैनात
पुलिस के मुख्य अधिकारी को भी ३० जनवरी के दिन किसी प्रशासनिक बैठक के निमित्त वहां
से हटा दिया गया था । बावजूद इसके दफ्तरी तौर पर षडयंत्र के तमाम जानकारों को संदेह
के दायरे से दूर ही रखा गया ।
हत्याकाण्ड में स्वातंत्र्यवीर विनायक सावरकर को तो गांधी का
प्रबल विरोधी होने और उस षडयंत्र की पूर्व-जानकारी रखने की महज कपोल-कल्पित आशंका के
आधार पर जांच-अधिकारियों ने आरोपित कर दिया था , किन्तु गौरतलब है कि गांधी के विरोधी
वे दूसरे प्रभावशाली लोग भी थे, जो प्रामाणिक तौर पर षड्यंत्र की जानकारी रखने और शासन-सत्ता
से जुडे होने के कारण उसे विफल भी कर सकते थे । मगर उन लोगों की ओर तनिक संदेह भी नहीं
किया गया । गांधीजी की तत्कालीन रीति-नीति एवं योजना से कांग्रेस के सबसे बडे नेता
ही उनके प्रबल विरोधी बन गये थे ।
महात्मा के महात्म्य के सहारे सत्ता
के शीर्ष पर पहुंचे वे स्वनामधन्य नेता महात्माजी को किस कदर अप्रासांगिक समझने लगे
थे , यह जानने के लिये सिर्फ एक ही उदाहरण पर्याप्त है.- देश की आजादी जब सुनिश्चित हो गयी, तब महात्माजी
ने कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष व देश के अंतरीम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु को पत्र
लिखा था, स्वतंत्र भारत की शासन-व्यवस्था का स्वरुप निर्धारित करने के लिये । उन्होंने इच्छा व्यक्त की थी कि देश में भारत की
जरुरत के अनुसार उनके सपनो का “हिन्द-स्वराज” स्थापित किया जाये.। लम्बे समय तक चले
ततविषयक पत्र-व्यवहार के दौरान नेहरुजी ने अंततः उन्हें बडी बेरूखी से झिड्क दिया कि
हम भारत में लोकतान्त्रिक-समाजवाद की स्थापना करेंगे, “ हिन्द-स्वराज “ जैसी फालतू
बातों पर चर्चा के लिये न उनके पास समय है, न कांग्रेस के पास । गांधीजी निरूत्तर हो
गये । पुनः आजादी के बाद मंत्रिमंडल में शामिल कांगेसी नेताओं के भ्रष्टाचरण पर क्षोभ
जताते हुये महात्माजी ने जब यह सिफारिश कर दी कि “ देश को आजादी दिलाने का उद्देश्य
पूरा हो गया सो अब कांग्रेस का एक राजनीतिक-संगठन के रुप में काम करना उचित नहीं है,
क्योंकि देश में हरिजनोद्धार व ग्रामीण-पुनर्निंर्माण के अनेक महत्वपूर्ण काम करने
को पडे हुये हैं , इसलिए कांग्रेस को भंग कर उसे ‘लोकसेवक संघ’ बना दिया जाये , तो नेहरुजी ने उस
पर नाराजगी जताते हुए साफ इंकार कर दिया था ।
तभी से महात्माजी कांग्रेस के क्रिया-कलापों
से न केवल असहमत रहने लगे थे , बल्कि सत्ता मिलते ही कांग्रेस की कार्य-संस्कृति में
घुस आये भ्रष्टाचार की सार्वजनिक मुखालफत भी करने लगे थे । इतना ही नहीं , बल्कि वे
कुछ समय पहले से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्पृश्यता-रहित समाज-निर्माण के कार्यों
से प्रभावित हो उसकी ओर झुकाव भी रखने लगे थे । २५ दिसम्बर १९३४ को वे वर्धा में आयोजित
संघ के एक प्रशिक्षण शिविर और १६ सितम्बर १९४७ को दिल्ली की भंगी बस्ती में लगी संघ-शाखा
पर जाकर उसकी कार्य-शैली की प्रशंसा ही नहीं किए थे , बल्कि स्वयंसेवकों के साथ भगवा
ध्वज को प्रणाम कर उसकी वन्दना भी कर चुके थे । ऐसे में आप समझ सकते हैं कि महात्मा
जी के जीवन के प्रति कौन लोग उदासीन थे ? जिस संगठन को वे भंग कर देने की सिफारिश कर
दिये थे उसके नेता ? या जिस हिन्दुत्वनिष्ठ-संगठन की ओर उनका झुकाव होने लगा था उस
हिन्दुत्व के प्रखर प्रवक्ता ?
बावजूद इसके , महात्माजी के जीते-जी उनकी
नीतियों की हत्या करनेवालों ने उनकी शरीर-हत्या हो जाने पर खुद को उनका उतराधिकारी-भक्त
प्रदर्शित करने तथा राजनीतिक लाभ लेने के लिये शासनिक शक्ति के सहारे विभाजन-जनित हिन्दू-मुस्लिम-विद्वेष के उस दौर में
सावरकर और संघ का नाम आरोपित करवा दिया । सावरकर को जेल में डलवा दिया और संघ पर प्रतिबन्ध
लगवा दिया । हांलाकि न्यायालय ने सावरकर को निष्कलंक आरोप-मुक्त कर दिया और संघ को
भी प्रतिबन्ध से मुक्त कर दिया , किन्तु दोनों के विरुद्ध जो दुष्प्रचार किया गया उसका
राजनीतिक लाभ तो कांग्रेस आज तक ले ही रही है । “सफेद-आतंक ः ह्यूम से माईनो तक” नामक
मेरी पुस्तक में इस मुद्दे पर व्यापक बहस-विमर्श हुआ है । परिस्थिति-जन्य साक्ष्य बताते
हैं कि कांग्रेस का सत्ता-लोलुप शीर्ष नेतृत्व और उसके हाथों सत्ता हस्तांतरित करने
वाले ब्रिटिश वायसराय, दोनों को महात्माजी
दो कारणों से चूभ रहे थे । एक को कांग्रेस भंग कर देने की उनकी योजना के कारण तो दूसरे
को देश-विभाजन की रेखा मिटा देने की उनकी तैयारी के कारण । मालूम हो कि देश-विभाजन
से उत्पन्न हिंसक-उन्मादी हालातों की वजह इस कदर मर्माहत थे कि वे विभाजन-रेखा मिटा
देने के लिए एक विशाल जुलूस लेकर पाकिस्तान जाने , वहां कुछ दिन रहने और फिर लम्बे
जुलूस के साथ भारत वापस आने की एक गुप्त योजना के क्रियान्वयन की तैयारी कर चुके थे
। उनकी इस योजना का संक्षिप्त खुलासा ‘लापियर एण्ड कालिन्स की पुस्तक फ्रीडम ऐट मिडनाइट’
में हुआ है , जिसके अनुसार अगर वे सफल हो जाते तो विभाजन मिट सकता था । ऐसी परिस्थितियों
में कदाचित लार्ड माऊण्ट बैटन और नेहरू दोनों ही महात्मा को भारत के राजनीतिक क्षितिज
से दूर कर देने की जुग्गत में रहे हों , जिन्हें नत्थूराम गोडसे की योजना का पता चला
तो वे अप्रत्यक्ष रूप से उसे सफल हो जाने की तमाम अनुकूलतायें उपलब्ध करा दिए हों ;
इस सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है । किन्तु इन सब कोणों से उस मामले की जांच
हुई ही नहीं और जांच-प्रक्रिया को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर घुमा कर दिग्भ्रमित
कर दिया गया ।
· मनोज ज्वाला ; जनवरी’ २०१७
· दूरभाष- ९९७३९३६३९१
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